क्या कश्मीर केवल देश का खून चूस रहा है
अब देखते हैं कि कैसे कश्मीरी हमारा खून चूस रहे हैं कश्मीर के बारे में आर्थिक आँकड़े टटोलने की कोशिश कीजिये आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। आप क्या सोचते हैं कि कश्मीर में गरीबी की दर क्या हो सकती है बाकी भारत के मुकाबले कम या ज्यादा १० प्रतिशत या २० प्रतिशत। तमाम छातीकूट दावों के बावजूद हकीकत यह है कि कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ ३-४ प्रतिशत जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकत २६ प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में) और ऐसा क्यों है क्योंकि उन्हें पर्यटन (जो कि ९०प्रतिशत भारतीय पर्यटक ही हैं) सूखे मेवों और पशमीना शालों के निर्यात से भारी कमाई होती है। ऊपर से तुर्रा यह कि कश्मीर को केन्द्र की तरफ से भारी मात्रा में पैसा मिलता है, मदद, सब्सिडी और सहायता के नाम पर सीएजीआर की रिपोर्ट के अनुसार १९९१ में कश्मीर को १,२४४ करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया जो कि वर्ष २००२ तक आते-आते बढ़कर ४,५७८ करोड़ रूपए हो गया था (सन्दर्भ इंडिया टुडे १४ अक्टूबर २००२) १९९१ से २००२ के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का ५ प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के सबसे निकम्मे और उद्दंड लड़के को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले मदद के नाम पर। क्या आपको बचपन में सुनी हुई कोयले और कौव्वे की कहानी याद नही आई? जिसमें कोयल अपने अंडे कौव्वे के घोंसले में रखे देती है और कौवा उसके अंडे तो सेता ही है, कोयल के बच्चे भी जोर-जोर से भूख-भूख चिल्लाकर कौव्वे के बच्चों से अधिक भोजन प्राप्त कर लेते हैं। ठीक यही कश्मीर में हो रहा है, वे हमारे पैसों पर पाले जा रहे और वे इसे अपना हक बताकर और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमादार करंदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है। जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे तो कंाग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ तो उसे तारीफ की बजाये उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से जोंक की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर बेचारा और धर्मनिरपेक्ष एक बार रेलयात्रा में गृह मंत्रालय के एक अधिकारी मिले थे, उन्होंने आपसी चर्चा में बताया कि कश्मीर में आतंकवाद कभी भी खत्म नहीं होगा, क्योंकि आतंकवाद के धंधे से जुड़े लगभग सभी पक्ष नहीं चाहते कि इसका खात्मा हो। और खुलासा चाहने पर उन्होंने बताया कि आतंकवाद से लडऩे के नाम पर कश्मीर में पुलिस, बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना को केन्द्र से प्रतिवर्ष ६०० से ८०० करोड़ रूपया सस्पेंस अकाउंट में दिया जाता है, जिसका कोई अॅाडिट नहीं किया जाता, न ही इस बारे में अधिकारियों से कोई सवाल किया जाता है कि वह पैसा कहाँ और कैसे खर्चा हुआ। इसी प्रकार का सस्पेंस अकाउंट प्रत्येक राज्य की पुलिस को मुखबिरों को पैसा देने के लिये दिया जाता है (अब वह पैसा मुखबिरों तक कितना पहँुचता है, भगवान जाने)। अब इसे दूसरी तरह से देखें, तो कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार १०,००० रूपये की सब्सिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग ४० प्रतिशत ज्यादा है, और यह विशाल धनराशि राज्य को सीधे खर्च करने को दी जाती है ( कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अलगाववादियों, आतंकवादियों और अफसरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, ट्रंासपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिए मिला हुआ है। इसके अलावा अरबों रूपये की विभिन्न योजनाएं, जैसे रेलवे की जम्मू-उधमपुर योजना ६००, करोड़ उधमपुर श्रीनगर-बारामुला योजना ५००० करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर २००० करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट ९०० करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट ६००० करोड़, डल झील सफाई योजना १५० करोड़ यानी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, लेकिन एक अंधे कुँए में। तो इस बात पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वहाँ की आम जनता की आर्थिक हालत तमाम आतंकवादी कार्रवाईयों के बावजूद, देश के बाकी राज्यों के गरीबों के मुकाबले काफी बेहतर है।
अब देखते हैं कि कैसे कश्मीरी हमारा खून चूस रहे हैं कश्मीर के बारे में आर्थिक आँकड़े टटोलने की कोशिश कीजिये आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। आप क्या सोचते हैं कि कश्मीर में गरीबी की दर क्या हो सकती है बाकी भारत के मुकाबले कम या ज्यादा १० प्रतिशत या २० प्रतिशत। तमाम छातीकूट दावों के बावजूद हकीकत यह है कि कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ ३-४ प्रतिशत जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकत २६ प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में) और ऐसा क्यों है क्योंकि उन्हें पर्यटन (जो कि ९०प्रतिशत भारतीय पर्यटक ही हैं) सूखे मेवों और पशमीना शालों के निर्यात से भारी कमाई होती है। ऊपर से तुर्रा यह कि कश्मीर को केन्द्र की तरफ से भारी मात्रा में पैसा मिलता है, मदद, सब्सिडी और सहायता के नाम पर सीएजीआर की रिपोर्ट के अनुसार १९९१ में कश्मीर को १,२४४ करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया जो कि वर्ष २००२ तक आते-आते बढ़कर ४,५७८ करोड़ रूपए हो गया था (सन्दर्भ इंडिया टुडे १४ अक्टूबर २००२) १९९१ से २००२ के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का ५ प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के सबसे निकम्मे और उद्दंड लड़के को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले मदद के नाम पर। क्या आपको बचपन में सुनी हुई कोयले और कौव्वे की कहानी याद नही आई? जिसमें कोयल अपने अंडे कौव्वे के घोंसले में रखे देती है और कौवा उसके अंडे तो सेता ही है, कोयल के बच्चे भी जोर-जोर से भूख-भूख चिल्लाकर कौव्वे के बच्चों से अधिक भोजन प्राप्त कर लेते हैं। ठीक यही कश्मीर में हो रहा है, वे हमारे पैसों पर पाले जा रहे और वे इसे अपना हक बताकर और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमादार करंदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है। जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे तो कंाग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ तो उसे तारीफ की बजाये उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से जोंक की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर बेचारा और धर्मनिरपेक्ष एक बार रेलयात्रा में गृह मंत्रालय के एक अधिकारी मिले थे, उन्होंने आपसी चर्चा में बताया कि कश्मीर में आतंकवाद कभी भी खत्म नहीं होगा, क्योंकि आतंकवाद के धंधे से जुड़े लगभग सभी पक्ष नहीं चाहते कि इसका खात्मा हो। और खुलासा चाहने पर उन्होंने बताया कि आतंकवाद से लडऩे के नाम पर कश्मीर में पुलिस, बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना को केन्द्र से प्रतिवर्ष ६०० से ८०० करोड़ रूपया सस्पेंस अकाउंट में दिया जाता है, जिसका कोई अॅाडिट नहीं किया जाता, न ही इस बारे में अधिकारियों से कोई सवाल किया जाता है कि वह पैसा कहाँ और कैसे खर्चा हुआ। इसी प्रकार का सस्पेंस अकाउंट प्रत्येक राज्य की पुलिस को मुखबिरों को पैसा देने के लिये दिया जाता है (अब वह पैसा मुखबिरों तक कितना पहँुचता है, भगवान जाने)। अब इसे दूसरी तरह से देखें, तो कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार १०,००० रूपये की सब्सिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग ४० प्रतिशत ज्यादा है, और यह विशाल धनराशि राज्य को सीधे खर्च करने को दी जाती है ( कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अलगाववादियों, आतंकवादियों और अफसरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, ट्रंासपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिए मिला हुआ है। इसके अलावा अरबों रूपये की विभिन्न योजनाएं, जैसे रेलवे की जम्मू-उधमपुर योजना ६००, करोड़ उधमपुर श्रीनगर-बारामुला योजना ५००० करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर २००० करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट ९०० करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट ६००० करोड़, डल झील सफाई योजना १५० करोड़ यानी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, लेकिन एक अंधे कुँए में। तो इस बात पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वहाँ की आम जनता की आर्थिक हालत तमाम आतंकवादी कार्रवाईयों के बावजूद, देश के बाकी राज्यों के गरीबों के मुकाबले काफी बेहतर है।
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