श्योराण जाट गोत्र का इतिहास
भलेराम बेनीवाल [31] के अनुसार यह जाटों का प्राचीन गोत्र है. महाभारत में इनका उल्लेख सूर्यासर के रूप में हुआ है. शूर राजा पांडव राजा युधिष्ठिर के यज्ञ में शामिल हुये थे. भारतीय साहित्य में इनका नाम शूरालिखा है. गुप्त काल में शूर सेन लिखा है. ईरान के रोअन्दिज नामक प्रान्त पर श्योराण जाटों का राज्य था. श्योराण कबीला आज भी वहां पर आबाद है. हुमायुंनामा के अनुसार श्योराण गोत्र के जाटों का मालवा में राज्य था. वहां से किसी कारण राजस्थान के नीमराणा के स्थान पर पहुंचे तथा राज्य स्थापित किया.
इस गोत्र के बारे में कहावत है कि श्योराण जाटों का राजपूतों से झगड़ा होता रहा और ये आगे बढते रहे. इसी प्रकार ये लोग लोहारू क्षेत्र में पड़ने वाले गांव सिधनवा में पहुंचे और वहीं बस गये. यहीं के महाराज ने इनको कुछ एरिया दे दिया. जिसे बाद में इन्होने रियासत के रूप में स्थापित किया, लुहारू व दादरी में अपनी बढोतरी की और धीरे-धीरे लुहारू में ५० गांव व दादरी में २५ गांव में फ़ैल गये. आज श्योराण गोत्र के दादरी में ४७ गांव तथा लुहारू में ७० गांव हैं. सिधनवा व चहड कला इस गोत्र के प्रधान गांव हैं.
श्योराण खाप चौरासी की पंचायत संगठन इस बात का प्रतीक है. इस खाप के फ़ैसलों को राजाओं ने भी माना है. एतिहासिक तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि दिल्ली के जाट सम्राट अनंगपाल तोमर की पुत्री रूकमणी के दो पुत्र थे-एक पृथ्वी राज व दूसरा चाहर देव. पृथ्वीराज का दिल्ली पर राज्य रहा. गौरी से परास्त होने के बाद पृथ्वीराज चौहान का वध कर दिया. गौरी ने चाहर देव के लड़के विजयराज को कर के बदले राज्य सौंप दिया. विजयराज के दो पुत्र थे- श्योरा (सोमराव) तथा दूसरा समराव (श्युमरा). इन्होने भी गौरी के साथ लड़ाई में भाग लिया. युद्ध हारने के बाद ये दोनों जंगलों में चले गये और भिवानी के पास सिधनवा गांव में सिद्ध तपस्वी के डेरे पर शरण ली. फ़िर जंगल साफ़ करके वहीं पर श्योराण खाप के वर्तमान गांवों की स्थापना की.
हरफ़ूल जाट जुलाणी वाला इसी गोत्र का है
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