कितना सरल है किसी को बुजदिल कह देना ! कभी मृत्यु को करीब से देखा है ? कभी हाथ में विष उठाया है ? कभी गले में फंदा डाल अपने आप से बहस की है ? कभी मरना चाहकर भी अपने परिवार के बारे में सोचकर मरने का कार्यक्रम स्थगित या रद्द किया है ? जिस जान से ९० साल के अधमरे बीमार वृद्ध तक चिपके रहते हैं उसी जान को जब कोई किशोर एक झटके में दे डालता है तो उसकी मनःदशा क्या रही होगी ? बस वह पल यदि निकल जाता तो कल वह फिर युद्ध में जूझने को निकल पड़ता । सोचो कहाँ हम माता पिता में कमी रह गई ? कहाँ हमारी शिक्षा प्रणाली में कमी रह गई ? क्यों हम अपने बच्चों को आश्वस्त नहीं कर सके कि जो भी हो ,सफल रहें या असफल, हर हाल में वे हमारे पास वापिस आ सकते हैं और नए सिरे से जीवन आरम्भ कर सकते हैं , कि हम उन पर अपनी जजमेंट नहीं पास करेंगे, कि जीवन बहुत बड़ा और लम्बा है, कि एक जगह असफल भी रहो या आइ आइ टी जैसी जगह को भी छोड़कर यदि तुम कुछ और करना चाहोगे तो भी हम तुम्हारे साथ हैं ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढो । बच्चों पर जजमेंट न पास करो ।
बस इन्हीं भावों को लिए कविताएँ रच डालीं ।
कायर
१
मुझे कायर कहने वालो
मेरा जीवन जीकर देखो
बस इक झलक देख ही
मेरे जीवन की शायद
तुम इतना घबरा जाओगे
मेरे जीवन में न तुम
कभी वापिस आ पाओगे,
आओ तुमको भी अपने
मरने की झलक दिखाऊँ
आओ देखो तुम भी आकर
मुझे ए कायर कहने वालो ।
देखो कैसे हो जाता है जीवन बेमानी
कैसे फिर जाता है आशाओं पर पानी
कैसे इक बालक की दी जाती कुर्बानी
कैसे माता पिता ने न मेरी इच्छा जानी ।
मैंने बनना चाहा था इक चित्रकार
पर मुझे पकड़ाए चीर फाड़ के औजार
कितना मैंने उनको समझाना चाहा
सुन्दर चित्र अपने दिखाए बारम्बार
पर वे ना माने मेरे दिल की बात
पढ़ने को कहते थे मुझे वे दिनरात
पहुँच गया मैं पूरे करने उनके सपने
वे सपने जो ना थे मेरे कभी अपने ।
हाथ में चाकू था मुँह में उबकाई
कितना कहा था पापा से मैंने,
बात पर उन्हें नहीं समझ में आई,
उस दिन हद हो गई जब मृत स्त्री
एक काटने को मुझे पकड़ाई
मेरे सपनों में भी वह आती थी
कैसे काटूँ उसको मैं
चीर फाड़ ना कभी मुझे भाई
रात रात ना सो पाता था
उसका चेहरा नजर आता था
लिखा पत्र पापा को मैंने
ना होगी मुझसे ये पढ़ाई
वे बोले बेटा कैसे भी हो
तुम कर लो अपनी पढ़ाई
मेरा बेटा डॉक्टर होगा तो
देखो कितनी होगी बड़ाई
ना पूरी करो जो तुम शिक्षा
कितनी होगी जग हँसाई ।
उस दिन हाथ मेरे काँप रहे थे
कितनी सबने थी हँसी उड़ाई
फिर से मैं था बोला पापा
मैं न बन सकूँगा कभी कसाई
पर पापा बोले बन जा तू डॉक्टर
इसमें ही तेरी और हमारी भलाई
भाग गया था मैं अपने घर
पर फुसलाकर भेजा मुझको वापिस
ना झेल सका यह सब मैं जब
तब अपने गले में डाली रस्सी
उसमें मैंने मजबूत गाँठ लगाई
खिसका दी कुरसी पैरों से
जीभ मेरी थी बाहर आई
डाल कर देखो इक पल फंदा
या फिर इक उँगली को ही
तुम कस लो रबर बैंड से
और देखो कितना कष्ट
है इसमें ओ मेरे भाई
जीना मैंने भी चाहा था
पर ना इन शर्तों पर
मैंने जीना चाहा
बन चित्रकार जी तो लेता
पर यह काटम काट न
कभी मुझे भाई ।
सो अन्त हुआ मेरे जीवन का
बिना चाहत अपनी पूरी कर
मुक्ति है आशाओं से मैंने पाई
ओ मुझपर व्यंग्य करने वालो
आओ मेरा जीवन जी लो
छोड़ गया हूँ स्वप्न अधूरे
आओ कुछ तो तुम भी जी लो ।
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढो । बच्चों पर जजमेंट न पास करो ।
बस इन्हीं भावों को लिए कविताएँ रच डालीं ।
कायर
१
मुझे कायर कहने वालो
मेरा जीवन जीकर देखो
बस इक झलक देख ही
मेरे जीवन की शायद
तुम इतना घबरा जाओगे
मेरे जीवन में न तुम
कभी वापिस आ पाओगे,
आओ तुमको भी अपने
मरने की झलक दिखाऊँ
आओ देखो तुम भी आकर
मुझे ए कायर कहने वालो ।
देखो कैसे हो जाता है जीवन बेमानी
कैसे फिर जाता है आशाओं पर पानी
कैसे इक बालक की दी जाती कुर्बानी
कैसे माता पिता ने न मेरी इच्छा जानी ।
मैंने बनना चाहा था इक चित्रकार
पर मुझे पकड़ाए चीर फाड़ के औजार
कितना मैंने उनको समझाना चाहा
सुन्दर चित्र अपने दिखाए बारम्बार
पर वे ना माने मेरे दिल की बात
पढ़ने को कहते थे मुझे वे दिनरात
पहुँच गया मैं पूरे करने उनके सपने
वे सपने जो ना थे मेरे कभी अपने ।
हाथ में चाकू था मुँह में उबकाई
कितना कहा था पापा से मैंने,
बात पर उन्हें नहीं समझ में आई,
उस दिन हद हो गई जब मृत स्त्री
एक काटने को मुझे पकड़ाई
मेरे सपनों में भी वह आती थी
कैसे काटूँ उसको मैं
चीर फाड़ ना कभी मुझे भाई
रात रात ना सो पाता था
उसका चेहरा नजर आता था
लिखा पत्र पापा को मैंने
ना होगी मुझसे ये पढ़ाई
वे बोले बेटा कैसे भी हो
तुम कर लो अपनी पढ़ाई
मेरा बेटा डॉक्टर होगा तो
देखो कितनी होगी बड़ाई
ना पूरी करो जो तुम शिक्षा
कितनी होगी जग हँसाई ।
उस दिन हाथ मेरे काँप रहे थे
कितनी सबने थी हँसी उड़ाई
फिर से मैं था बोला पापा
मैं न बन सकूँगा कभी कसाई
पर पापा बोले बन जा तू डॉक्टर
इसमें ही तेरी और हमारी भलाई
भाग गया था मैं अपने घर
पर फुसलाकर भेजा मुझको वापिस
ना झेल सका यह सब मैं जब
तब अपने गले में डाली रस्सी
उसमें मैंने मजबूत गाँठ लगाई
खिसका दी कुरसी पैरों से
जीभ मेरी थी बाहर आई
डाल कर देखो इक पल फंदा
या फिर इक उँगली को ही
तुम कस लो रबर बैंड से
और देखो कितना कष्ट
है इसमें ओ मेरे भाई
जीना मैंने भी चाहा था
पर ना इन शर्तों पर
मैंने जीना चाहा
बन चित्रकार जी तो लेता
पर यह काटम काट न
कभी मुझे भाई ।
सो अन्त हुआ मेरे जीवन का
बिना चाहत अपनी पूरी कर
मुक्ति है आशाओं से मैंने पाई
ओ मुझपर व्यंग्य करने वालो
आओ मेरा जीवन जी लो
छोड़ गया हूँ स्वप्न अधूरे
आओ कुछ तो तुम भी जी लो ।
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