दयानंदजी जापान घूमने गये चारो तरफ माँस मछली लटक रही थी| मै क्या खाऊँ कैसे खाऊँ... हाथ पर हाथ रखकर आँखे भारी करते हुए दयानंद सरस्वती बोले. एक दिन भूखा बीता दूसरा बीता तीसरा भी बीता पर खाने को कुछ नही मिला जापान मे दुकानो पर शाकाहार का नाम लेते ही लोग हँसकर मना कर देते तभी एक छोटी सी फ्रुट स्टॉल पर एक 12 साल का बच्चा बैठा था. मैने कहा - बच्चे मेरी हालत खराब है कुछ शाकाहार खाने को मिल जाये तो बच्चे ने तुरंत फल आगे किये और कही से जोङ तोङ जुगाङकर दाल चावल ले आया मैने पेट भर खाया अब मै भारत आने के लिये उर्जा से परिपूर्ण था. मैने बच्चे को पैसे दिये - बच्चे ने मना कर दिया मैने कहा कीमत तो लेनी होगी तुम्हे मै भारतीय हूँ ऐसे ही मुफ्त का नही खा सकता बच्चे ने कहा ठीक तो मुझे मुह माँगी कीमत देने का वादा करो दयानंदजी ने वादा कर दिया. बच्चा बोला-"यही कीमत अदा कर देना कि भारत मे जाकर ये न बताना कि आपको मेरे जापान मे तीन दिन भूखा रहना पङ गया" स्वामीजी की आँखे नम हो उठी काश मेरे भारत के लोगो मे भी होता आज ये स्वाभिमान.. तो आज हम पूर्ण सवारज देश के नागरिक होने पर गर्व करते
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